आजन्म कारावास और पेरोल पर कैदी  जब आशाएं बिखर जाती है उम्मीद भी तार तार हुवे फटे दामन को सिकोड़ लेती हैं तब वही निरपराध कैदी जो बंधक बनते समय हाथ पैर पटकता है चिल्लाता है कहता है मेरा ये घर नहीं, मेरी ये जगह नहीं और जेल में तमाम दूसरे कैदी उसकी मजाक बनाते हैं कैसे कैसे उस पर वार करते हैं अपने भाग्य पर रोता वह पुरजोर कोशिश करता है बाहर जाने की खुली हवा में उड़ जाने की वह देखता है नफरत भरी निगाहों से कैद की दीवारों को जेलर को, जेल के नुमाइंदों को और उन बदसलूक साथियों को जो जरूर अपराधी होंगे या उसकी तरह बेवजह सबूतों के अभाव में बेड़ियों में जकड़े होंगे| पर जेल में कैदी पर कितने ही जुल्म ढ़ाए मानसिक शारीरिक सामाजिक अवसादों से घिर गया वो और इतनी यंत्रणा दी गयी और प्रताड़ित किया गया कि उसकी आवाज गले में फंस उसके लिए फांसी का फंदा हो गयी| और तब वह हार जाता है अपनी ही आवाजों से हार जाती हैं आशाएं, उम्मीदें तिनका तिनका हवाओं में उड़ जाती है तब वह स्वीकार कर लेता है अपना आजन्म कारावास मान लेता है उस जेल को अपना घर और वहाँ की कडुवाहट घुटन ये उसके अपने जीने के सामान हो जाते है वह जीने लगता है मरने के लिए या मर मर के भी मरता है, रोज जीने के लिए दसकों बाद उसका सदाचार सनैः सनैः हो जाता है उजागर और फिर मुनादी होती है,आता है हुक्मनामा कैदी के, पेरोल का | कैदी असमंजस में अब बाहर उसका कोई अपना नहीं टूट चुके शीशों के किरचो सा, सपना भी कोई बचा नहीं पहले उसे बदनाम किया था, अब कहीं उसका नाम नहीं शीशे में खुद की सूरत भी तो बदल चुकी है और अब तो बाहर की दुनियां भी अजनबी हो चली है बाहर जाना मतलब बिना दीवारों की कैद में होना सभ्य अजनबी चेहरों में अपने चहेते क्रूर बंदियों का अभाव का होना और फिर पतझड़ में मुरझाया फूल गुजरे बसंतों में खिल नहीं सकता इसलिये गुहार करता है कैदी , हुक्मरानो से पेरोल उसकी खारिज करो बंद कैद में ही उसको सड़ने दो, मरने दो|
डॉ नूतन डिमरी गैरोला २२ – ०६ - २०११
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