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Sunday, May 1, 2011

वो स्त्री और चित्रकार - डॉ नूतन गैरोला


     painter                           


वो एक कलाकार था और एक चित्रकार भी
रंग भरता रहा जिन तस्वीरों पर
यादों के पन्नों पर उकेरी वो आकृतियाँ
चटख रंगों से
हर आँखों में असमंजस भरती हुवी
मन का केनवास नहीं बदला था,
बदली नहीं थी कुछ हाथ की तूलिकाएं
बदला था दिल
बदल गए थे पात्र
महज कुछ तूलिकाएं जो जुडी थी उस स्त्री की यादों से
फैंक दी गयीं
दूर से ही केनवास पे नजरे गाढ़े वह स्त्री
और उसे जलाता गया वह चित्रकार 
निःशब्द थी वह स्त्री, मौन आवाक
और उंगलियां चित्रकार की खींचती रही नित नयी कई आकृतियाँ
निर्वस्त्र रेखाएं, पिघलते रंगों से दहकते ढकते
और आँखों पे उस स्त्री के कोई किरकिरा चुभता रहा
साँसों को काटता बरछी सा
सीने को चाक करता रहा
और वह मूक जलती रही
तीव्र प्रेम की वेदना में धुंवा धुंवा होती रही
जाना था उसने प्यार है
ये जलना, पिघलना, धुंवा होना, राख होना
उस स्त्री को रास आने लगा था जलना
कहती थी वह-
चित्रकार तू जलाता रह
तेरी जिद की हद भी मैं जानती हूँ
अब मैं सिर्फ धुंवा होना राख होना मांगती हूँ
और बस आखिर में एक और अहसान मांगती हूँ 
मेरी कुछ तस्वीरें जो बोझा होंगी नए चित्रों के रिश्तों में
और धूल में पड़ी कहीं कूड़े में अपना ठिकाना ढूंढती होंगी,
बस एक एक कर उन चित्रों को जला दे,
कर्ज इस स्त्री की वफ़ा का कुछ इस तरह चुका दे
फिर खुद को स्वछन्द खुली हवा दे,
और नए रंगों को, नयी आकृतियों को अपने केनवास  में पनाह दे,

इस जलन को इस आग को खुल के हवा दे|

 

 

nutan ..burning

Photo –  My Own Photo Edited in Web.

 

डॉ नूतन डिमरी गैरोला



 

42 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

दो सीमायें व्यक्त करते चित्र और बीच में झूमती कविता।

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही गहरे भावों को समेटे उत्कृष्ट रचना....क्या चित्रण किया है..लाजवाब।

अपर्णा said...

nutan , shabd -chitr sundar ban pada hai . bas isi tarah likhti raho. hardik badhai! ye rachna pahale ki rachnaon se nitant alag hai. gathan hai kavita mein, jo aakarshit karta hai.

शिखा कौशिक said...

bahut gahan bhavon ko ukerti aapki rachna sarahniy hai .badhai .

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

वफ़ा के बदले कुछ दे न दे पर बद्दुआ तो न दे :)

राज भाटिय़ा said...

वाह बहुत ही गहरी भावपुर्ण रचना, धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इस जलन को आग को खुल कर हवा दे ..बहुत गहन भाव लिए अच्छी रचना

Udan Tashtari said...

कलाकार तो कमाल है... :)

Patali-The-Village said...

बहुत गहन भावों को उकेरती एक सराहनीय रचना| धन्यवाद|

सुशील बाकलीवाल said...

वफा जिनसे थी बेवफा हो गये हैं...

टोपी पहनाने की कला...

गर भला किसी का कर ना सको तो...

सतीश सक्सेना said...

उफ़ ....!
मन को हिला गयी यह रचना ....हार्दिक शुभकामनायें आपको !!

मनोज कुमार said...

यही समर्पण और सर्वस्व न्यौछवार की अभिलाषा तो प्यार है!
वाह
वाह! अद्भुत!!

Kailash C Sharma said...

बहुत गहरे भाव समेटे एक उत्कृष्ट मर्मस्पर्शी रचना..आभार

वन्दना said...

ओह्…………बेहद गहन और मार्मिक्…………आज फ़ेसबुक पर ऐसा ही मिलता कुछ मैने भी लिखा है सुबह्………यही कैनवस यही मन और यही चित्रकार ……………कभी कभी कैसी समानता सी आ जाती है ना विचारों में।

कविता रावत said...

मन का केनवास नहीं बदला था,
बदली नहीं थी कुछ हाथ की तूलिकाएं
बदला था दिल
बदल गए थे पात्र
महज कुछ तूलिकाएं जो जुडी थी उस स्त्री की यादों से
फैंक दी गयीं
दूर से ही केनवास पे नजरे गाढ़े वह स्त्री
.....सच! समय कितना कुछ बदल देता है! सबकुछ रंगमंच की तरह चलता रहता है .....एक आता है दूसरा जाता है...
बहुत अच्छी भावपूर्ण रचना

Patali-The-Village said...

बहुत गहरे भाओं को उकेरती सुन्दर रचना| धन्यवाद|

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 03- 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 03- 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Sadhana Vaid said...

इस जलन को इस आग को खुल के हवा दे|

बहुत दर्द भरा है इस रचना में ! उसके मन की आँच औरों तक भी पहुँच रही है ! प्रभावशाली प्रस्तुति ! बधाई स्वीकार करें !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

SURENDRA BAHADUR SINGH (JHANJHAT) said...

वाह नूतन जी ...............

गहनतम एहसासों को मार्मिक अभिव्यक्ति देती आपकी गज़ब की रचना ह्रदय की गहराइयों से निकली है .....और ह्रदय में गहराई तक उतर जा रही है |

Anand Dwivedi said...

बस एक एक कर उन चित्रों को जला दे,
कर्ज इस स्त्री की वफ़ा का कुछ इस तरह चुका दे
फिर खुद को स्वछन्द खुली हवा दे,
और नए रंगों को, नयी आकृतियों को अपने केनवास में पनाह दे,

इस जलन को इस आग को खुल के हवा दे|
..
बेहद अफसोश है कि चित्रकार हर बार एक पुरुष ही होता है ....पता नही ऐसा क्यों होता है....हर बार हर एक के अहसासों में....एक जो कांटा सा होता है वो कोई ना कोई आदमी ही होता है.....
डा. साहिबा धन्यवाद दुखी करने के लिए .....या अगर यूँ कहूं तो इतनी सहजता से सम्बन्धों के उहापोह को कैनवास पर उतरा है कि....मन अजीब सा हो गया.!
एक लेखिका कि यही सफलता है बधाई हो !

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut marmik chitran kar diya aapne ek canvas par utarti aakriti ka apne man ke bhaavo ka. sunder abhivyakti.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

श्रीमान जी, मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत गहरे भाव लिए रचना .....फोटो और पोस्ट का प्रस्तुतीकरण बहुत उम्दा .....हमेशा की तरह

Babli said...

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी कल ही लगाये है. इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

नए रंगों को, नयी आकृतियों को अपने केनवास में पनाह दे,
--
गहरे मनोभाव समेटे सुन्दर रचना!

Bhushan said...

मन के उलझे भावों के बीच चित्रकार को प्रमुख रख कर रचयिता को उदात्त रूप दिया है. सुंदर रचना.

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

मन के बिभिन्न रंग गंभीर गहरे भाव उलझन को व्यक्त करे सुन्दर रचना
बधाई हो

अब मै सिर्फ धुवाँ होना राख होना मांगती हूँ
चित्रकार तू जलाता रह -
शुक्ल भ्रमर ५

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० नूतन जी कमाल की कविता है बधाई और शुभकामनाएं |

डॉ. हरदीप कौर सन्धु said...

बहुत गहरे भाव .......

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें बार बार पढने का मन होता है। आपकी ये रचना उनमें से एक है। बहुत सुंदर

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

कृपया मेरी भी कविता पढ़ें और अपनी राय दें..
www.pradip13m.blogspot.com

Richa P Madhwani said...

http://shayari10000.blogspot.com

ZEAL said...

Very different type of creation. Loving the pic and the Chitrkaar as well.

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi achhi rachna

मदन शर्मा said...

देर से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ बहुत सार्थक रचना है आपकी | आपने मेरे पोस्ट पर आकर मेरा हौसला बढाया इसके लिए आपका धन्यवाद !!

मदन शर्मा said...

देर से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ |बहुत खूब! कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।
बहुत सार्थक रचना है आपकी | आपने मेरे पोस्ट पर आकर मेरा हौसला बढाया इसके लिए आपका धन्यवाद !!

उपेन्द्र नाथ said...

bahut hi marmik aur sunder prastuti.............

Richa P Madhwani said...

http://shayaridays.blogspot.com

सहज साहित्य said...

नूतन जी आपकी यह कविता एक अव्यक्त व्यथा में अभिषोक्त है -आदि से अन्त तक । कविता का पोर-पोर व्यथा का जीता -जागता अनुवाद 1